Saturday, October 25, 2008

न होती सरहदे


रात का सन्नाटा चारो तरफ खामोशी
तेरे प्यार मे छाई है मुझ पर यूं बेहोशी!!
दिन भर तड़प कर गुज़रता है मेरा
रात आती है ख़याल लेकर तेरा !!
गर न होते हम इंसान न होती सरहदे
तो क्या होता जो तोड़ देते हम सभी हद्दें !!
फिर कौन हक जताता किसी पर इस कदर
रोज़ हम मिलते न होता किसी का भी डर !!
आज जब तूं बात करने से भी डरती है
तुझे क्या पता मेरी जान किस कदर जलती है !!
दुआएं तुझे जितनी भी दूँ वो बहुत कम हैं
तुझे क्या पता की मेरे सिने मे कितने गम हैं !!
चाहता हूँ तेरे चेहरे पर मुस्कुराहट हो हमेशां
पर जानता हूँ तूं कैसे खुश रहेगी गर मै हूँ परेशां!!